Thursday, 24 November 2016

कुछ कहती है ये ज़िंदगी

कुछ कहती है ये ज़िंदगी

चल   रही  है  मद्धम  मद्धम, चहकती है ये ज़िंदगी 
नए फ़साने ओढ़ कर अब बहकती है ये  ज़िंदगी

फूलों की इन पंक्तियों  पे, इक भवरे सा मैं  बैठा हूँ
मेरे नन्हे हाथों पर सिमटती है ये ज़िन्दगी

संगम है नन्हे  सपनों का, पर कांटो पर ये है खड़ी
उम्मीदों के कवच में ही, अब पलती है ये ज़िंदगी

काजल सी काली रातों में टिमटिमाती हैं  खुशियाँ नयी
रंगों के इस जज़ीरे में अब ढ़लती  है ये ज़िंदगी

पापा  के कन्धों पर चढ़कर खिलखिलाता सा इक बचपन है
माँ के कोमल हाथों का वो स्वाद है ये ज़िंदगी .

बच्चों जैसे चीखती है, चिल्लाती है ये रूह मेरी
कीचड़ जैसे  इस दलदल  में अब  हस्ती है ये ज़िंदगी 

धड़कन की इजाज़त से, अब साँसे हामी भर्ती हैं
हर पहर करवट बदलूँ पर कटती नहीं है ज़िंदगी 

खोजता है तू  खजानों में, उन  सिमटे हुए मकानों में
भटकता है तू देस विदेश पर दुबकती रही ज़िंदगी 

कोना कोना छान लिया, आँखों से इस घमंडी ने
पर देखा न माँ  की आँखों को जहाँ बिलखती रही ज़िंदगी 

रिश्तों की नन्ही डोर है जो प्यार से  पिरोनी है
 कांटो की इस गोद में अब पलती है ये ज़िंदगी 





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